योग की जड़ें भारत में कितनी गहरी हैं, ये इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि लगभग सारे जैन या बौद्ध गुरुओं की मूर्तियां योग मुद्राओं में ही मिलती हैं। लेकिन जैसे ही यूएनओ ने भारत सरकार की पहल पर 21 जून को इंटरनेशनल योग डे घोषित किया, देश में पक्ष विपक्ष में उसका श्रेय लेने और योग को बदनाम करने की भी सोशल मीडिया पोस्ट्स शेयर की जाने लगीं। ऐसे में कई लोगों ने कहा कि पहले योग मुद्रा में भी लोग समाधि ले लेते थे। किसी ने सोशल मीडिया पर लोकमान्य गंगाधर तिलक की भी एक तस्वीर शेयर की, योग मुद्रा में समाधि लेते हुए तिलक। तो किसी ने योग मुद्रा में एक कंकाल तक की तस्वीरें शेयर कीं। किसी ने ये भी दावा किया कि हड़प्पा सभ्यता में एक मुद्रा पर भगवान शिव की तस्वीर भी योग मुद्रा में मिली है। तीनों ही तस्वीरें योग की एक खास मुद्रा में थीं, पदमासन मुद्रा में। हमने इन तीनों तस्वीरों की पड़ताल की।

Tilak Memorial: A Gift From the People of Bombay

जब आप गूगल में ‘’ Lokmanya Tilak was cremated in the sitting legs crossed position‘’ सर्च करते हैं तो आपको वो तस्वीर एक दो नहीं सैकड़ों साइट्स पर मिल जाती है। इस तस्वीर में तिलक की आंखें बंद हैं, गले में फूलमालाएं पड़ी हुई हैं। तिलक पदमासन मुद्रा में हैं, योग की एक खास मुद्रा जिसमें पालथी मारने के बाद पैरों को एक दूसरे के ऊपर चढ़ा लेते हैं। उनकी गोद में उनके अखबार केसरी और मराठा का कुछ कॉपियां रखी हुई हैं। आसपास लोगों का हजूम साफ दिख रहा है। ये तस्वीर कई वेबसाइट्स पर मौजूद है।

गिरिगांव चौपाटी, मुंबई पर उनका अंतिम संस्कार होना था। ऐसा लगा था पूरा महाराष्ट्र उमड़ पड़ा हो। सरदार ग्रह, क्रॉफर्ड मार्केट से गिरिगांव चौपाटी तक सारा रास्ता लोगों से भर गया था, उन दिनों बताया जाता है कि कम से कम दो लाख की भीड़ थी। गांधीजी, नेहरू, शौकत अली और सैफुद्दीन किचलू ही नहीं उस वक्त मुंबई की तमाम हस्तियां भी चौपाटी पहुंची थी। उनके सबसे बड़े बेटे अनुतोष ने मुखाग्नि दी थी। उससे पहले उनकी इच्छानुसार पदमासन में बैठी अवस्था में ही चिता पर बैठाया गया था।

दूसरी तस्वीर सिंधु सभ्यता से जुड़ी हैं। ये 1928-29 की बात है, जब पुरातत्वविद ईजेएच मैके मोहनजोदाड़ो में खुदाई का काम कर रहे थे। तब मोहनजोदाड़ो साइट के दक्षिण में ब्लॉक 1 में जमीन से 3.9 मीटर नीचे एक मुद्रा मिली, जो सेलखड़ी की बनी है। ये वही DK-G इलाका था, जिसमें विशाल स्नानागार मिला था। माना जाता है कि ये मुद्रा 2350 से 2000 साल ईसा पूर्व की है। इसकी लम्बाई और चौड़ाई क्रमश: 3.56 और 3.53 सेमी है और .76 सेमी मोटाई है। इस मुद्रा पर पदमासन की मुद्रा में बैठे एक व्यक्ति का चित्र खुदा है। उसके सर पर सींगों का मुकुट है और वो एक सिंहासन पर हठ योग की कमल मुद्रा में पैरों को करके बैठा है। पूरी सिंधु सभ्यता में योग का ये एकमात्र उदाहरण मिला था, जोकि मुद्रा पर था। हाथों में 8 बड़ी और 3 छोटी चूडियां या कड़े बने हुए हैं। छाती एक नेकलेस जैसे किसी आभूषण या माला से ढकी हुई है, कमर में दो परतों में कोई कपड़ा जैसा लिपटा हुआ है। क्योंकि इसे नक्काशी के जरिए बनाया गया है। इसलिए केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।

IndianHistory on Twitter: "2,700 Year Old Yogi in Samadhi Found in ...

इस व्यक्ति के चित्र के आस पास चार जानवरों के चित्र भी हैं, जो नीचे शांत मुद्रा में बैठे हुए हैं। जिनमें से हाथी और चीता एक तरफ हैं और एक भैंस और गैंडा दूसरी तरफ हैं। सबसे नीचे दो हिरणों या जंगली जानवरों के भी चित्र बने हुए हैं, दो पीछे की तरफ देख रहे हैं। जानवरों के इन चित्रों की वजह से ही इसे पशुपति सील कहा गया, माना जाता है कि हिंदू देव भगवान शिव का ये चित्र हो सकता है। उस वक्त आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर जनरल जॉन मार्शल ने मान भी लिया था इस सील पर योग मुद्रा में शिव ही अंकित हैं। मार्शल का मानना था कि इस पुरुष आकृति के तीन सिर थे और वह उन्नत-शिश्न था। उसे इस देवता और परवर्ती हिंदू धर्म के शिव में आश्चर्यजनक समानता दिखाई दी, जो महायोगी और पशुपति (पशुओं का स्वामी) के नाम से जाना जाता है’’।   

तीसरी तस्वीर थी एक कंकाल की, जो योगमुद्रा में बैठे हुए है। यानी या तो उसने उसी मुद्रा में समाधि ली थी, या मरने के बाद उसको उसकी इच्छानुसार उसी मुद्रा में दफनाया गया था। चूंकि उसका कंकाल का सर नहीं है, तो हो सकता है कि योग करते वक्त उसका सर काट दिया गया हो। जिसके आसार काफी कम हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में जो पदमासन की स्थिति उस कंकाल की है, वो बिगड़ गई होती। पड़ताल की गई तो पता चला कि ये कंकाल नब्बे के दशक में मिला था, जो मिला था राजस्थान के बालाथल में। कार्बन डेटिंग से इस कंकाल की उम्र निकाली गई जो करीब 2700 साल पहले की आई। हालांकि ये सिंधु सभ्यता के खत्म होने के बाद के दिनों की हो सकती है, लेकिन फिर भी भारत के इतिहास में एक योगी का योग मुद्रा में कंकाल मिलना वाकई में नई बात थी।

2,700 Year Old Yogi in Samadhi Found in Indus Valley Civilization Archaeological Site

ये भी पदमासन मुद्रा में है, ठीक वैसी ही जैसी सिंधु सभ्यता के हठयोगी की है, राजस्थान के बालाथल में मिला कंकाल भी पदमासन में है लेकिन ज्ञान मुद्रा में। बालाथल में जो योगी का कंकाल मिला है, उस साइट को सबसे पहले वीएन मिश्रा ने 1962-63 में खोजा था, उसका सर्वे किया था। लेकिन खुदाई शुरू हो पाई 1994 में, जो पुणे के डेक्कन कॉलेज पीजी एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के डिपार्टमेंट ऑफ आर्कियोलॉजी और इंस्टीट्यूट ऑफ राजस्थान स्टडीज ने ज्वॉइंट प्रोजेक्ट के तहत की। दरअसल ये स्थान उदयपुर से 42 किमी दूर और बल्लभ नगर से केवल 6 किमी दूर है।

इसे बनास और आहार सभ्यता से जोडा गया, जिसका कनेक्शन उस वक्त के हड़प्पा नहरों से हो सकता है। क्योंकि इस जगह का काल 4500 साल पहले करीब लगाया जा रहा है। इस खुदाई में योगी समेत कुल पांच कंकाल पाए गए थे। जिनमें से एक का सैक्स पता नहीं चल पाया, दूसरा एक पचास साल के पुरुष का था, जिसके घुटनों में कोई समस्या रही होगी। तीसरा एक पैंतीस साल की महिला का था, उसके सर के पास एक लोटा रखा पाया गया, शायद कोई प्रथा रही होगी। जबकि एक और कंकाल से रिसर्चर्स ने अंदाजा लगाया था कि इसे कोढ़ का रोग रहा हो सकता है। ये भी भारत में कोढ़ का सबसे पुराना मामला माना गया है।

एक और दिलचस्प बात ये है कि इस साइट पर मिला योगी कंकाल अगर 2700 साल से लेकर 4500 साल पुराना है तो वो वैदिक युग से भी पहले चला जाता है। ये भी अचम्भे की बात है कि अगर आप कंकाल के हाथों की उंगलियों को ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि इस योगी कंकाल के अंगूठे सबसे छोटी उंगली को छू रहे हैं, योग में इसे ज्ञान मुद्रा कहा जाता है। करीब तीन हजार साल तक ना हड्डियों का कुछ बिगड़ना और ना ही योग मुद्रा में रत्ती भर भी बदलाव आना वाकई में चौंकाने वाला है। आप शिव की तमाम मूर्तिय़ों और चित्रों में इसी मुद्रा को देख सकते हैं। शिव को इसीलिए आदियोगी कहा जाता है। मेडिटेशन करने और समाधिलीन होने की ये मुद्रा हजारों साल से प्रचलन में है।

लोकमान्य तिलक की तस्वीर हो, बालाथल में मिले कंकाल की तस्वीर हो या फिर मोहन जोदाड़ो से मिली पशुपति की मुद्रा, तीनों योग की एक ही अवस्था में थे। ऐसा नहीं है कि इससे पुराने या इनके अलावा ऐसे उदाहऱण और नहीं मिलेंगे, पुरातत्वविद लगे हुए हैं। उम्मीद है कि इतिहास में होने वाले नए खुलासे योगा के इतिहास को और भी समृद्ध करेंगे।