VV Giri Death Anniversary के मौके पर आप वीवी गिरी से जुड़ी दिलचस्प कहानी जानिए। वीवी गिरि यानी भारत के वो राष्ट्रपति जिनको जितवाने के लिए देश की पीएम इंदिरा गांधी ने अपनी ही पार्टी कांग्रेस के राष्ट्रपति पद के ऑफीशियल कैंडिडेट को भी हरवाने में कोई कोताही नहीं की और वीवी गिरि ने भी इस अहसान का बदला चुकाया, इंदिरा गांधी को पद पर रहते हुए ही भारत रत्न देकर। भारतीय राजनीति के दिलचस्प किरदार हैं वीवी गिरि।

जब भारत के राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन की मौत हो गई, वीवी गिरी उस वक्त उप राष्ट्रपति थे, उनको कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया गया। सिंडिकेट चाहता था कि उनके बीच के ही नेता नीलम संजीव रेड्डी को प्रेसीडेंट बना दिया जाए, जबकि वो पहले से लोकसभाध्यक्ष थे। इंदिरा को ये डर था कि कहीं सिंडिकेट की पसंद का राष्ट्रपति बन गया तो कल को उन्हें गद्दी से उतारकर मोरारजी की ताजपोशी की जा सकती है। ऐसे में उन्होंने जगजीवन राम का नाम कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग में रखते हुए गांधीजी के उस जन्मशती वर्ष में दलित को सर्वोच्च अधिकार देने के सपने की याद दिलाई। लेकिन सिंडिकेट के नेताओं के आगे इंदिरा गांधी की एक ना चली और नीलम संजीवा रेड्डी को कांग्रेस का ऑफीशियल प्रेसीडेंट कैंडिडेट बना दिया गया।

इधर वीवी गिरी ने प्रेसीडेंट की पोस्ट के लिए निर्दलीय ही नामांकन कर दिया। सीजेआई मौ. हिदायुल्लाह को कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया गया। सिंडिकेट ने ये भी ऑफर किया कि गिरि को लोकसभाध्यक्ष बनाया जा सकता है। माना जाता है कि गिरी को खड़ा करने में परदे के पीछे से इंदिरा गांधी की ही भूमिका थी। नीलम संजीवा रेड्डी आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे, तब वो इलाका मद्रास प्रेसीडेंसी में आता था। गांधीजी जब 1929 में वहां के दौरे पर आए तो रेड्डी भी स्वतंत्रता की जंग में कूद पड़े। बाद में जब 1956 में आंध्र प्रदेश बना तो नीलम संजीवा रेड्डी को उसका पहला चीफ मिनिस्टर बनाया गया।

628 Raghu Rai, Power politics

जब कामराज योजना के तहत कई प्रदेशों के चीफ मिनिस्टर्स इस्तीफा देकर दिल्ली में पार्टी को संभालने आ गए तो नीलम संजीवा रेड्डी भी उन्हीं में से एक थे। धीरे धीरे नॉन हिंदी भाषी क्षेत्रों के कांग्रेसी नेताओं का एक गुट पार्टी में ताकतवर हो चला था, उसको सिंडिकेट कहा जाने लगा। नेहरू के बाद इस गुट ने शास्त्रीजी और फिर इंदिरा को पीएम बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। नीलम संजीवा रेड्डी भी उसी ग्रुप में शामिल हो गए, कामराज, अमूल्य घोष, एस निंजालिंगप्पा आदि कई क्षेत्रीय ताकतवर नेता इस ग्रुप में थे।

इंदिरा ने अपनी चाल चली और बतौर लोकसभा में कांग्रेस सदस्यों का नेता होने के चलते कांग्रेस सदस्यों के लिए व्हिप जारी करने से साफ मना कर दिया और कांग्रेसी सासंदों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने को कहा। कुल 163 कांग्रेसी सांसदों ने वीवी गिरी को वोट दिया और कांग्रेस शासित 12 राज्यों में से 11 राज्यों में बहुमत भी रेड्डी को मिला।

इधर इंदिरा को आसानी सिंडिकेट के इस फरमान से भी हो गई कि जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी के कैंडिडेट सीडी देशमुख को दूसरी प्राथमिकता का वोट दिया जाए। इंदिरा ने चुनाव को लैफ्ट बनाम राइट का नारा देकर गिरी के सपोर्ट को नैतिक बल भी दिया। इधर जीत वीवी गिरी की हुई और उधर अपनी ही पार्टी के कैंडिडेट को हराकर इंदिरा भी जीत गईं। हालांकि वीवी गिरि पहले राउंड में पिछड़ गए थे, लेकिन दूसरी पसंद के वोट्स से जीत गए।

अब नीलम संजीवा रेड्डी क्योंकि लोकसभाध्यक्ष के पद से भी इस्तीफा दे चुके थे, सो उन्होंने राजनीति को अलविदा कहना ही बेहतर समझा और अपने गांव लौट गए। लेकिन जैसे ही जेपी ने सम्पूर्ण क्रांति का ऐलान किया, वो भी वापस आकर जनता पार्टी से जुड़ गए। 1977 में वो अकेले जनता पार्टी उम्मीदवार थे जो आंध्र प्रदेश से जीते थे। उन्हें जनता पार्टी सरकार में लोकसभा स्पीकर चुन लिया गया, राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की मौत के बाद राष्ट्रपति चुनाव हुए तो वो राष्ट्रपति उम्मीदवार बन गए और तीन महीने सत्रह दिन के अंदर लोकसभा स्पीकर की पोस्ट से इस्तीफा दे दिया। कुल 37 उम्मीदवारों में से 36 कैंडिडेट्स की उम्मीदवारी रिटर्निंग ऑफिसर ने कुछ ना कुछ खामियों के चलते रद्द कर दी औऱ इस तरह नीलम संजीवा रेड्डी देश के पहले निर्विरोध राष्ट्रपति चुने गए और तब तक सबसे कम उम्र के भी, तब वो 64 साल के थे।