Sanjay Gandhi Death Anniversary एक ऐसा मौका है, जिस दिन मीडिया और उनके परिवार, चाहने वाले लोग संजय गांधी के जीवन से जुड़ी घटनाएं याद करते हैं। हम भी आपके लिए लेकर आए हैं एक ऐसी ही दिलचस्प कहानी, इंदिरा से जुड़े सबसे मशहूर नारे की, वो नारा था- इंदिरा इज इंडिया। लेकिन ये नारा ऐसे ही नहीं गढ़ दिया गया, इसके पीछे है एक दिलचस्प कहानी और संजय गांधी का गुस्सा।

आप सबने ‘इंदिरा इज इंडिया’ का नारा तो खूब सुना होगा, लेकिन इसके पीछे की कहानी शायद ना पता हो की किस मजबूरी में इमरजेंसी के वक़्त कांग्रेस प्रेसिडेंट देवकांत बरूआ को ये नारा ईजाद करना पड़ा और फिर इतनी जिल्लत झेलनी पड़ी की अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कविता लिखकर बरूआ को ‘चमचों का सरताज’ तक बोल दिया। जब भी इमरजेंसी की सालगिरह आती है, बरुआ के इंदिरा इज इंडिया नारे की चर्चा होती है तो अटलजी की उस कविता की भी चर्चा होती है। सोशल मीडिया के तौर में तो ये कुछ ज्यादा ही होने लगा है। ऐसे में नई पीढ़ी पूरी तरह मामला समझ नहीं पाती है। इस लेख में जानिए पूरी कहानी।

दरअसल 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को रायबरेली के 1971 के चुनावों मे अनियमितताओं का दोषी ठहराया औऱ उनकी संसद सदस्यता रद्द कर दी, 6 साल के लिए चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। जब इंदिरा गांधी को ये खबर लगी तो पूरे पीएम हाउस में अफरातफरी का माहौल था. सुबह ही खबर आई कि इंदिरा के करीबी डीपी धर की मौत हो गई है तो पहले इंदिरा वहां गईं। इंदिरा को सुबह से ही कुछ बुरा होने की आशंका लग रही थी। ये फैसला जज जगमोहन लाल सिन्हा की अदालत ने दिया था।

इंदिरा ने इस्तीफे का मूड बना लिया था, लेकिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे, जो इंदिरा के दोस्त भी थे, उस दिन दिल्ली में थे। वो इंदिरा से मिलने पहुंचे, उन्होंने इंदिरा को समझाया कि इतनी जल्दी फैसला नहीं लेना चाहिए, हमें पहले हर पहलू पर चर्चा कर लेनी चाहे। इंदिरा को लगा बुरा दिन है, दो बुरी खबरें आईं हैं इस्तीफा दे देना चाहिए। वो अपने बाकी करीबियों से इस बारे में राय ले रही थीं। उसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष डीके बरुआ भी वहां पहुंचे। उन्हें स्थिति अपने अनकूल लगी, उन्होंने सुझाव दिया कि कुछ दिन के लिए इंदिरा को कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभाल लेनी चाहिए और तब तक उन्हें पीएम बना देना चाहिए।

संजय गांधी उस वक्त अपनी गुडगांव की मारुति फैक्ट्री में थे। संजय लंच के लिए घर आए थे, उनको किसी भी बात की खबर नहीं थी, लेकिन घर के हालात और इतने साले लोगों के चेहरे उतरे देखकर उन्होंने पता कर लिया कि आखिर में हुआ क्या है। उनको पता चल गया कि हाईकोर्ट का फैसला मां के खिलाफ आया है, जब उन्हें ये खबर लगी कि उनकी मां इस्तीफा देने की भी सोच रही हैं, तो संजय को ये ठीक नहीं लगा।

संजय गांधी इंदिरा को अलग एक कमरे में ले गए, और गुस्से में बोले कि कोई जरूरत नहीं इस्तीफा देने की। इधर देवकांत बरुआ के ऑफर से भी संजय गांधी बिफर गए थे औऱ इंदिरा को समझाया कि आपकी करीबियों में कोई भी विश्वासपात्र नहीं है, सबकी नजर आपकी कुर्सी पर है, देवकांत का ऑफर मानेंगी तो ये गद्दी से कभी नही उतरेगा।

 

इधर देवकांत को जब ये अहसास हुआ कि उनकी सलाह उलटी पड़ गई है और कल को उन्हें टारगेट किया जा रहा है तो इंदिरा से रिश्ते सुधारने के लिए फ़ौरन एक नारा ईजाद कर दिया- इंदिरा इज इंडिया। कांग्रेस नेताओं ने इसे हाथों हाथ लिया, बरूआ से सबक गुस्सा भी जाता रहा।  लेकिन उन दिनों जेल में बंद अटल बिहारी वाजपेयी ने बरूआ को टारगेट करके जेल में ही एक कविता लिख डाली–

इंदिरा इंडिया एक है इति बरुआ महाराज,
अक्ल घास चरने गई , चमचों के सरताज!
चमचों के सरताज, किया भारत अपमानित,
एक मृत्यु के लिए कलंकित भूत भविष्यत!
कह कैदी कविराय, स्वर्ग से जो महान है,
कौन भला उस भारत माता के सामान है??

आज नारे से ज्यादा अटलजी की इस कविता की चर्चा होती है। इंदिरा गांधी भी समझ गई थीं कि इंदिरा इज इंडिया का नारा उनके लिए नुकसानदेह हो सकता है, धीरे धीरे इस नारे को कांग्रेसियों ने लगाना कम कर दिया, लेकिन चर्चा आज तक होती है और अटल जी की इस कविता की भी।