जगन्नाथ रथ यात्रा, पुरी मंदिर का ये महोत्सव पूरी दुनियां के हिंदुओं के लिए कुम्भ जैसा ही है, यूं कई शहरों में रथ यात्राएं शुरू हो चुकी हैं, लेकिन पुरी रथ यात्रा को लेकर भक्तों के जोश में कमी नहीं आई है। इस बार पूरे 285 साल बाद ये रथ यात्रा रुकी है, तो वो भी कोर्ट के आदेश से, क्योंकि कोरोना का कहर जारी है। ऐसे में जगन्नाथ के लाखों अनुयायी ये मांग कर रहे हैं कि यात्रा तो ही ही सकती थी, भले ही गिनती के लोग इसमें होते। ऐसे में आपके लिए ये जानना और दिलचस्प होगा कि पिछले 700 साल के इतिहास में इस रथ यात्रा पर इस साल से पहले 10 बार रोक लगी और हर बार किसी ना किसी मुस्लिम आक्रांता की वजह से, कुल 32 साल रथ यात्रा नहीं हो पाई, आज जानिए पूरी कहानी।

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1360 के दिसम्बर महीने में दिल्ली के सुल्तान फीरोज शाह तुगलक ने पुरी पर हमला किया, पूरे शहर को जमकर लूटा गया, पुरी मंदिर को लूटा गया और तोड़ दिया गया, मूर्तियों को भी तोड़ दिया गया। जमकर तबाही मचाई गई। उस साल यात्रा बाधित हुई, कई साल सदमे में ही निकल गए। उसके बाद मंदिर की तरफ 200 सालों तक किसी ने आंख उठाकर नहीं देखा।

लेकिन 1568 में बंगाल के शासक सुलेमान किर्रानी ने अपने एक खूंखार सिपहसालार जो काला पहाड़ के नाम से कुख्यात था को पुरी पर हमला करने के लिए भेजा, उसके हमले ने फिर से मंदिर में तबाही ला दी। कुल 9 साल रथ यात्रा नहीं हो पाई, 1568 से 1577 तक। शुरू होने के 24 साल बाद यानी 1601 में फिर एक और हमला मंदिर पर हुआ, ये हमला बंगाल के नवाब के कमांडर मिर्जा खुर्रम ने किया। तब तक मंदिर के पुजारी को समय पर सूचना मिल चुकी थी। उन्होंने मंदिर की सभी मूर्तियों को समय रहते पुरी से 13-14 किलोमीटर दूर कपिलेश्वर में पंचमुखी गोसाईं मंदिर में भिजवा दिया। तब भी रथ यात्रा उस साल नहीं हो पाई, मूर्तियां भी नहीं थीं।

6 साल बाद ही 1607 में ही फिर हुआ चौथा हमला, हमला करने वाला था मुगल सूबेदार कासिम खान, वो उड़ीसा का सूबेदार था। समय रहते फिर मूर्तियों को वहां से हटाया गया और सुरक्षित खुर्दा के गोपाला मंदिर में भेज दिया गया और फिर एक बार रथ यात्रा नहीं हो पाई। 4 साल बाद मुगलों ने फिर उड़ीसा के अपने नए सूबेदार को मंदिर पर हमला करने के लिए भेजा था, उसका नाम सुनकर चौंक जाएंगे आप, क्योंकि इस मंदिर पर हमला करने वाला ये अकेला हिंदू था, टोडरमल का बेटा कल्याण मल। उसे उड़ीसा का सूबेदार बनाकर ये काम सौंपा गया था।

वो तो समय रहते मूर्तियां चिलका झील के महिसानसी में भेज दी गई थीं, सो बच गईं, लेकिन फिर इस साल रथयात्रा नहीं हो पाई। छठा हमला भी कल्याण मल के अधीन मुगल सेना ने 6 साल बाद ही यानी 1617 में किया, लेकिन इस बार मूर्तियां बचाकर चिलका झील के गुरुबाईगढ़ में भेजकर बचा ली गईं। रथयात्रा उस साल भी नहीं हो पाई। 1621 में फिर नए मुगल सूबेदार अहमद बेग ने हमला किया, इस 7वें हमले में मूर्तियां इस बार खुर्दा के गढमिनित्री गांव भेजकर बचाई गईं, लेकिन ना 1621 में रथ यात्रा हो पाई और ना अगले साल।

अगले 70 साल कोई हमला नहीं हुआ, 1692 में हमला किया इकराम खान ने। इस बार 8वें हमले में मूर्तियां बानापुर भेजकर बचाई गईं, लेकिन 1707 तक वो मूर्तियां वहां से नहीं लाई नहीं जा सकीं। कुल 13 साल तक रथयात्रा नहीं हो पाई। पुजारी हर बार मूर्तियों को सुरक्षित रखने की जगह बदल रहे थे। 9वां हमला 1731 में किया उड़ीसा के नायाब नाजिम तारिक खान ने। मूर्तियां एक जगह भेजने की बजाय अलग अलग जगहों पर सुरक्षित रखने के लिए भेजी गईं। उस साल भी रथ यात्रा नहीं हो पाई।

10वां हमला भी तारिक खान ने ही किया, 2 साल बाद ही यानी 1733 में। इस बार पुजारी भी मूर्तियों के साथ किसी गुप्त स्थान पर छुपने चले गए, 2 साल वो गुप्त रूप से पूजा करते रहे। 1733 से 1735 तक रथ यात्रा तीन साल नहीं हो पाई। अब 11 वीं बार ये रथयात्रा रुकी है, तो कोरोना के चलते कोर्ट के आदेश से।

ISKCON के वाइस प्रेसीडेंट हैं राधारमण दास, वो मांग कर रहे हैं कि कोर्ट प्रतीकात्मक तौर पर बिना लोगों के भी इस यात्रा को जारी रखने का आदेश दे सकती है ताकि जो काले धब्बे आक्रांताओं के नाम दर्ज हैं, कोर्ट के नाम ना हों।