नई दिल्ली: कोरोना के चलते हुए मानसिक दवाब की वजह से 34 साल के एक पत्रकार तरूण सिसोदिया ने एम्स की चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली. दुनिया के लिए खबर लिखने वाला ही एक खबर बनकर रह गया. जिस अखबार के लिए उसने सैंकड़ों खबरें लिखी होगी उसके आखिरी पेज पर छोटे से कॉलम में शायद कल ये खबर छप जाए, या ना भी छपे क्योंकि ये दुनिया ऐसी ही है. जबतक आपकी जरूरत है तबतक आप अहमियत रखते हैं, आप काम के नहीं तो आपको घर का टूटा-फूटा बर्तन समझकर दफ्तर से फेंक दिया जाता है.

बताया जा रहा है कि तरूण कोरोना की वजह से तनाव में तो थे ही साथ ही उन्हें नौकरी जाने का भी खतरा था. एक तो कोरोना ऊपर से नौकरी जाने का खतरा, तरूण शायद ये तनाव बर्दाश्त नहीं कर पाए और जिदंगी को खत्म करने का फैसला कर बैठे. कुछ साल पहले ही तरूण की शादी हुई थी और उनकी छोटी सी बेटी है.

आप शायद इस खबर को पढ़कर अफसोस करेंगे और फिर भूल जाएंगे, ना जाने कितने लोग रोज मर रहे हैं उनमें से एक ये भी था. सरकार और प्रशासन के लिए तरूण आंकड़ा बनकर फाइलों में बंद हो जाएंगे, बात खत्म. कल कोई और होगा, परसो कोई और… ऐसा ही चलता आया और ऐसा ही चलता रहेगा. मगर उस नन्ही सी बच्ची के बारे में सोचिए जिसने अभी अपने पिता को पहचानना शुरू ही किया था. जब वो बड़ी होगी तो शायद स्मृतियों में भी उसे अपने पिता का चेहरा याद नहीं आएगा. जब अपने दोस्तों के पापा को उनके साथ खेलते, उन्हें गोद में उठाकर लाते ले जाते देखेगी तो कैसा महसूस करेगी.

तरूण की पत्नी जब मोहल्ले की बाकी महिलाओं को ऋंगार करते देखेंगी, उन्हें करवाचौथ पर सज-धजकर पूजा करते देखेंगी तो उनके दिल पर क्या गुजरेगी.. तरूण के पिता जिन्होंने कभी तरूण को कंधे पर बिठाकर घुमाया होगा, वो जब उसकी लाश को कंधा देंगे तो क्या महसूस करेंगे? ऐसे ही उनकी मां, बहन, दोस्त, रिश्तेदार और तरूण की जिंदगी से जुड़े लोग क्या महसूस करेंगा.

अब आप कहेंगे कि तरूण ने तो खुदकुशी की, उनकी मौत के जिम्मेदार वो खुद हैं. कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो तरूण को बुजदिल कहेंगे, कायर कहेंगे, जिंदगी से लड़ने का लेक्चर देंगे लेकिन कोई नहीं समझेगा वो दर्द वो तकलीफ जिससे तरूण गुजर रहे थे. जरा सोचिए, मरने से पहले क्या तरूण को अपनी बेटी का ख्याल नहीं आया होगा? क्या उनकी आंखों के सामने वो सारे चेहरे नहीं आए होंगे जिनसे उनकी जिंदगी जुड़ी थी और उनके जाने के बाद वो नर्क हो जाएगी, मगर फिर भी तरूण ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया.. बस एक बार तरूण की जगह खुद को रखकर उस तकलीफ और मानसिक दवाब का अंदाजा लगाने की कोशिश कीजिए. आसान नहीं है लेकिन फिर भी करके देखिए, शायद आप समझ सकें. ना भी समझ सके तो कोई तकलीफ नहीं क्योंकि इस देश में आज भी मानसिक रोगी को पागल ही समझा जाता है और मानसिक चिकित्सक को पागलों का डॉक्टर.