कई दिनों से ये खुलासा राजनीतिक गलियारों से होते हुए सोशल मीडिया के माध्यम से आम आदमी के बीच पहुंच चुका था कि 2008 में अपने देश में सरकार चलाने वाली पार्टी कांग्रेस और चीन में सरकार चलाने वाली कम्युनिस्ट पार्टी ने सरकारों के बजाय पार्टियों के बीच एक एमओयू साइन किया है, जिसमें कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी ने हस्ताक्षर किए थे। उस मीटिंग में ना केवल सोनिया गांधी मौजूद थीं, बल्कि उस वक्त वाइस प्रेसीडेंट शी जिनपिंग भी मौजूद थे। अब खबर आ रही है कि सुप्रीम कोर्ट इस सीक्रेट डील की जांच का आदेश एनआईए को भी दे सकता है।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में 2 वकीलों ने इस डील को गैरकानूनी बताया है और सुप्रीम कोर्ट में इस डील की जांच के लिए नेशनल इन्वेस्टिगेंटिंग एजेंसी (NIA) से जांच करवाने की मांग की है। ये याचिका सेवियो रोड्रिग्स और शशांक शेखर झा ने दायर की है और सुप्रीम कोर्ट को अब ये तय करना है कि एनआईए को इस डील की जांच सौंपनी है या फिर खारिज कर देना है।

शायद ही आपने कभी सुना हो, कि दो देशों की सत्ताधारी पार्टियां सरकारी समझौते के बजाय पार्टी स्तर पर समझौते कर रही हो। ये वो वक्त था जब 2009 के चुनाव सर पर थे और चीनी नहीं चाहते थे कि भारत में कोई राष्ट्रवादी किस्म की सरकार आए। सबसे दिलचस्प बात है कि इस समझौते पर खुद राहुल गांधी ने बतौर कांग्रेस महासचिव और उस मीटिंग में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से बतौर वाइस प्रेसीडेंट शी जिनपिंग भी मौजूद थे, वही शी जिनपिंग जो आज चीन के सर्वेसर्वा हैं।

चीन को लगता होगा कि कल को सरकार बदल गई तो क्या भारत में उनका कोई दोस्त होगा, शायद इसलिए ये समझौता किया गया हो। ये शक इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि राहुल गांधी ने डोकलाम के वक्त चीनी राजदूत से अपनी मीटिंग की खबरें छुपाने की कोशिश की थी। उसके बाद जब वो कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर गए तो चीनी मंत्रियों से मुलाकात की खबरें भी छुपाईं, जो बाद में एक टाउनहॉल कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कुबूलीं। आखिर ये लुकाछुपी क्यों होती रही है कांग्रेस की तरफ से? क्या चीन को अपनी मुफीद पार्टी की सरकार भारत में चाहिए और कांग्रेस को देश से बाहर भी अपने मददगार चाहिए, सरकार बनाने के लिए?

इस याचिका में तमाम आरोप राहुल गांधी और कांग्रेस पर लगाए गए हैं। दरअसल जब चीन के साथ गलवान वैली में हिंसक भिड़ंत हुई और 20 सैनिक शहीद हो गए तो चीन के अपनी संख्या ना बताने से मोदी सरकार के लिए मुश्किल हो गई और कांग्रेस ने सरकार को घेर लिया। तो बीजेपी ने भी राहुल गांधी को इस डील के लिए घेरा। ऐसे में आम जन भी आश्चर्य चकित हैं, कि जब सरकारें मौजूद हैं, तो 2 पार्टियों को डील करने की आपस में क्या जरुरत?

क्या दोनों पार्टियां विपक्ष में रहते हुुए भी एक दूसरे की मदद कर सकती हैं? क्या विपक्ष में रहकर सरकार के खिलाफ दुश्मन देश की सत्ताधारी पार्टी को मदद करना देशद्रोह नहीं? ऐसे तमाम सवालों से जूझेगी अब सुप्रीम कोर्ट, तभी उस याचिका में इसे गंभीर मसला बताते हुए एनआईए जैसी एजेंसी से जांच करवाने की मांग की गई है। सबसे बड़ा सवाल जो सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट करना है और वो ये कि क्या 2 देशों की राजनैतिक पार्टियां इस तरह का कोई एमओयू आपस में साइन कर सकती हैं?